मैं तमाम कोशिशों के बावजूद हार गयी ...
वो उसे मिल गाया जिसने उसे माँगा ही नहीं ..
हर एक से पुछा उसके ना मिलने का सबब
हर एक ने कहा वो तेरे लिए बना ही नहीं ...
Monday, August 9, 2010
Tuesday, August 3, 2010
Options...
माँ-बाप के लिए बेटी हमेशा परायी रही है ...
उस दिन क़यामत आएगी जिस दिन बेटियों ने माँ - बाप को पराया मान ना शुरू कर दिया.....
उस दिन क़यामत आएगी जिस दिन बेटियों ने माँ - बाप को पराया मान ना शुरू कर दिया.....
Sunday, August 1, 2010
आरज़ू
बातों बातों में अचानक बात तेरी चल गयी ...
दिल के अंधियारे में जैसे फुलझड़ी सी जल गयी ...
यूँ तो थे महफ़िल में सब अपने करीबी यार दोस्त ..
जब तेरा चर्चा हुआ तो तेरी कमी ही खल गयी ...
तेरी दिलकश बातें मुस्कान और जिन्दादिली ...
तेरा हो जाने की दिल में आरजू सी पल गयी ...
मिलते ही तुझसे नज़र बस मिल गयी थी जिंदगी
बदली जो तेरी नज़र तो जिंदगी भी छल गयी ...
दोस्तों की सब दुआएं निकली शायद बेअसर ..
और किसी एक दिलजले की बददुआ ही फल गयी ...
कुछ फ़साने कुछ हकीक़त कुछ अधूरी हसरतें ...
शाम तेरे संग शुरू हुई तेरे संग ही ढल गयी !!!
दिल के अंधियारे में जैसे फुलझड़ी सी जल गयी ...
यूँ तो थे महफ़िल में सब अपने करीबी यार दोस्त ..
जब तेरा चर्चा हुआ तो तेरी कमी ही खल गयी ...
तेरी दिलकश बातें मुस्कान और जिन्दादिली ...
तेरा हो जाने की दिल में आरजू सी पल गयी ...
मिलते ही तुझसे नज़र बस मिल गयी थी जिंदगी
बदली जो तेरी नज़र तो जिंदगी भी छल गयी ...
दोस्तों की सब दुआएं निकली शायद बेअसर ..
और किसी एक दिलजले की बददुआ ही फल गयी ...
कुछ फ़साने कुछ हकीक़त कुछ अधूरी हसरतें ...
शाम तेरे संग शुरू हुई तेरे संग ही ढल गयी !!!
Friday, July 30, 2010
Sprinkles ....
हर लम्हा हम इंतज़ार करते है उस एक लम्हे के लिए...
जिस लम्हा तुम आकर कहो ...
"एक लम्हा है हमारे पास तुम्हारे लिए....."
गुज़र जाएगी ज़िन्दगी “उस” के “बग़ैर” भी
वो “हसरत-ए-ज़िन्दगी” है “शर्त-ए-ज़िन्दगी” तो नहीं ..!!!
मंजिलें भी उसी कि थी ...रास्ता भी उसकी का था ...
एक मैं अकेली थी काफिला भी उसकी का था ...
साथ साथ चलने कि सोच भी उसी की थी ...
फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसकी का था ...
आज क्यूँ अकेली हूँ दिल सवाल करता है ...
लोग तो उसके थे ही ..पर क्या खुदा भी उसी का था....????
हमसे तो मोहब्बत में कुछ ना हो सका ...
तुमने खैर "बेवफाई" तो की....
बेवफा कह के बुलाया तो बुरा मान गए ..
आइना सामने आया तो बुरा मान गए ...
उनकी हर शाम गुजरती है दिवाली की तरह ...
एक दीप हमने जलाया तो बुरा मान गए ...
सोचा था उन्हें इस कदर भूल जाएँगे ...
देखकर भी उन्हें अनदेखा कर जाएँगे ...
पर आया जब जब चेहरा उनका सामने ...
दिल ने कहा इस बार देख लें, अगली बार भूल जाएँगे ...
दिल तोड़ कर मेरा वो बोले की मुस्कुराओ तो हम हंस दिए ..
आखिर सवाल उनकी ख़ुशी का था ...
पर उन्हें क्या एहसास है ...?
मैने खोया वो जो मेरा था ही नहीं ...
उन्होंने खो दिया वो जो सिर्फ उन्ही का था...
".........आज जिंदगी को तेरी आरज़ू नहीं है...
पर ऐसा भी नहीं कि तेरा इंतज़ार ना हो ........."
मग़र यूं टूटना बिखरना बुहत तकलीफ़ देता है !!
पर जितने मुझे ग़म मिले उतनी तो मेरी उम्र भी नहीं ..
जिस लम्हा तुम आकर कहो ...
"एक लम्हा है हमारे पास तुम्हारे लिए....."
गुज़र जाएगी ज़िन्दगी “उस” के “बग़ैर” भी
वो “हसरत-ए-ज़िन्दगी” है “शर्त-ए-ज़िन्दगी” तो नहीं ..!!!
मंजिलें भी उसी कि थी ...रास्ता भी उसकी का था ...
एक मैं अकेली थी काफिला भी उसकी का था ...
साथ साथ चलने कि सोच भी उसी की थी ...
फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसकी का था ...
आज क्यूँ अकेली हूँ दिल सवाल करता है ...
लोग तो उसके थे ही ..पर क्या खुदा भी उसी का था....????
हमसे तो मोहब्बत में कुछ ना हो सका ...
तुमने खैर "बेवफाई" तो की....
बेवफा कह के बुलाया तो बुरा मान गए ..
आइना सामने आया तो बुरा मान गए ...
उनकी हर शाम गुजरती है दिवाली की तरह ...
एक दीप हमने जलाया तो बुरा मान गए ...
सोचा था उन्हें इस कदर भूल जाएँगे ...
देखकर भी उन्हें अनदेखा कर जाएँगे ...
पर आया जब जब चेहरा उनका सामने ...
दिल ने कहा इस बार देख लें, अगली बार भूल जाएँगे ...
दिल तोड़ कर मेरा वो बोले की मुस्कुराओ तो हम हंस दिए ..
आखिर सवाल उनकी ख़ुशी का था ...
पर उन्हें क्या एहसास है ...?
मैने खोया वो जो मेरा था ही नहीं ...
उन्होंने खो दिया वो जो सिर्फ उन्ही का था...
".........आज जिंदगी को तेरी आरज़ू नहीं है...
पर ऐसा भी नहीं कि तेरा इंतज़ार ना हो ........."
तुझ से अब कोई वास्ता नहीं लेकिन ...
तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तन्हा गुज़रता है ...
किस की क्या मजाल थी जो कोई हमको ख़रीद सकता”,,,
“हम तो ख़ुद ही बिक गए ख़रीदार देख के ”
जो तुम बोलो बिख़र जायें, जो तुम चाहो संवर जायें ...
मग़र यूं टूटना बिखरना बुहत तकलीफ़ देता है !!
माना की ग़म ज़िंदगी का हिस्सा है
पर जितने मुझे ग़म मिले उतनी तो मेरी उम्र भी नहीं ..
ज़िन्दगी तेरा कोई अहसान नहीं है मुझ पे
मैंने दुनिया में हर एक साँस की क़ीमत दी है ...
इंतज़ार ....
मेरी सुबहों को तेरी शामों का ..मेरी शामों को तेरे वादों का ...
मेरी रातों को तेरे ख्वाबों का...मेरी नींदों को तेरी बाहों का...
मेरे जज्बों को तेरी चाहों का ...
बहकी बहकी सी कुछ खताओं का...खूबसूरत से कुछ गुनाहों का....इंतज़ार ...इंतज़ार ...
कोई बदली कभी इस कदर आएगी ...प्यास सदियों कि पल में बुझ जाएगी ...
तुझको लौटा के मेरे आगोश में देखना वक़्त कि नब्ज़ थम जाएगी ..
ऐसा होने कि कुछ दुआओं का ...उम्र भर जो मिलें उन पनाहों का
इंतज़ार ....इंतज़ार ...इंतज़ार ...इंतज़ार ...
अपने बादल का अपनी बारिश का ..अपने सावन का इंतज़ार ...
अपनी धड़कन का अपनी साँसों का ...अपने जीने का इंतज़ार ....
मेरी रातों को तेरे ख्वाबों का...मेरी नींदों को तेरी बाहों का...
मेरे जज्बों को तेरी चाहों का ...
बहकी बहकी सी कुछ खताओं का...खूबसूरत से कुछ गुनाहों का....इंतज़ार ...इंतज़ार ...
कोई बदली कभी इस कदर आएगी ...प्यास सदियों कि पल में बुझ जाएगी ...
तुझको लौटा के मेरे आगोश में देखना वक़्त कि नब्ज़ थम जाएगी ..
ऐसा होने कि कुछ दुआओं का ...उम्र भर जो मिलें उन पनाहों का
इंतज़ार ....इंतज़ार ...इंतज़ार ...इंतज़ार ...
अपने बादल का अपनी बारिश का ..अपने सावन का इंतज़ार ...
अपनी धड़कन का अपनी साँसों का ...अपने जीने का इंतज़ार ....
......Song ....मेरे अंदाज़ में
कुछ भी नहीं ....
ज़िन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं ...
तेरे दामन में मेरे वास्ते है क्या कुछ भी नहीं ....
मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो ...
मेरे हाथों में लकीरों के सिवाय कुछ भी नहीं ...
हमने देखा है कुछ ऐसे खुदाओं को यहाँ ...
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं ...
ऐ खुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार ...
रेत ही रेत है पैरों में हरा कुछ भी नहीं ....
दिल भी एक जिद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह ...
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं....
तेरे दामन में मेरे वास्ते है क्या कुछ भी नहीं ....
मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो ...
मेरे हाथों में लकीरों के सिवाय कुछ भी नहीं ...
हमने देखा है कुछ ऐसे खुदाओं को यहाँ ...
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं ...
ऐ खुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार ...
रेत ही रेत है पैरों में हरा कुछ भी नहीं ....
दिल भी एक जिद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह ...
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं....
.....Unknown
Thursday, June 3, 2010
एक कहानी : राहुल और तोता
उस दिन राहुल को घर जाने के रस्ते में एक घायल तोता मिला...
राहुल उसे उठा कर अपने घर ले गाया , उसके ज़ख्मों पर मलहम लगा कर राहुल ने तोते को फिर से चंगा कर दिया...
तोता ठीक होते ही उड़ने लगा , राहुल एक पिंजरा ले आया इस डर से कि कहीं तोता उस से दूर उड़ ना जाए
राहुल ने तोते को पिंजरे में रख दिया और रोज़ उस से बातें करने लगा ... तोते के लिए राहुल मीठे फल रोज़ ढूँढ कर लाता था ,
एक दिन राहुल ने चुपके से देखा कि तोता पिंजरे में उड़ने के लिए पंख फडफडा रहा है ,
राहुल को गलती का एहसास हुआ , राहुल को लगा कि उनसे तोते को छोटे पिंजरे में बंद कर के गलती कि है ...
राहुल कि वजह से तोते की उड़ते रहने कि ख़ुशी दूर हो गयी....
ये सोच राहुल को परेशान रखने लगी ...फिर एक दिन राहुल बड़ा पिंजरा लाया ...कमरे जितना बड़ा पिंजरा जिस में राहुल भी आ जा सकता था..
राहुल ने तोते को खुले कमरे में छोड़ा और कहा " खूब उडो खूब खुश रहो , तुम खुश हो तो मै खुश हूँ ..."
तोता मुस्कुराया ...कुछ पंख पसारे और कमरे का चक्कर लगा कर वापस राहुल के कंधे पर आ कर बैठ गाया,
राहुल खुश था ये सोच कर कि उसने तोते की ख़ुशी आखिर ढूंढ ही ली...
राहुल जैसे सब जनता था कि तोता कैसे खुश रह सकता है ... पर वो नहीं जनता था कि तोता कैसे खुश हो सकता है ...
राहुल को यकीन था कि तोता कैसे खुश रहेगा यह वो ही सबसे अच्छी तरह जनता है ... खुद तोते को भी नहीं पता कि जिंदगी को कैसे जीना है ....सीधी बात है अगर तोते को ज़िन्दगी जीने का ढंग आता तो क्यों वो घायल पड़ा होता सड़क पर...
अब सब ठीक है .... राहुल आज भी तोते को खुश करने के लिए ढेर सारे फल लाता है ... और तोता उन्हें खा कर खुश रहने कि कोशिश करता है ....ये सोच कर कि शायद किसी दिन ऐसे ही खुश रहते रहते वो खुश होना भी सीख जाएगा...
तोता साँसे ले रहा है आज भी .... खुश होने और खुश रहने के बीच के फासले को नापता ...
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।
हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती सॉंसों की डोरी ।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।
राहुल उसे उठा कर अपने घर ले गाया , उसके ज़ख्मों पर मलहम लगा कर राहुल ने तोते को फिर से चंगा कर दिया...
तोता ठीक होते ही उड़ने लगा , राहुल एक पिंजरा ले आया इस डर से कि कहीं तोता उस से दूर उड़ ना जाए
राहुल ने तोते को पिंजरे में रख दिया और रोज़ उस से बातें करने लगा ... तोते के लिए राहुल मीठे फल रोज़ ढूँढ कर लाता था ,
एक दिन राहुल ने चुपके से देखा कि तोता पिंजरे में उड़ने के लिए पंख फडफडा रहा है ,
राहुल को गलती का एहसास हुआ , राहुल को लगा कि उनसे तोते को छोटे पिंजरे में बंद कर के गलती कि है ...
राहुल कि वजह से तोते की उड़ते रहने कि ख़ुशी दूर हो गयी....
ये सोच राहुल को परेशान रखने लगी ...फिर एक दिन राहुल बड़ा पिंजरा लाया ...कमरे जितना बड़ा पिंजरा जिस में राहुल भी आ जा सकता था..
राहुल ने तोते को खुले कमरे में छोड़ा और कहा " खूब उडो खूब खुश रहो , तुम खुश हो तो मै खुश हूँ ..."
तोता मुस्कुराया ...कुछ पंख पसारे और कमरे का चक्कर लगा कर वापस राहुल के कंधे पर आ कर बैठ गाया,
राहुल खुश था ये सोच कर कि उसने तोते की ख़ुशी आखिर ढूंढ ही ली...
राहुल जैसे सब जनता था कि तोता कैसे खुश रह सकता है ... पर वो नहीं जनता था कि तोता कैसे खुश हो सकता है ...
राहुल को यकीन था कि तोता कैसे खुश रहेगा यह वो ही सबसे अच्छी तरह जनता है ... खुद तोते को भी नहीं पता कि जिंदगी को कैसे जीना है ....सीधी बात है अगर तोते को ज़िन्दगी जीने का ढंग आता तो क्यों वो घायल पड़ा होता सड़क पर...
अब सब ठीक है .... राहुल आज भी तोते को खुश करने के लिए ढेर सारे फल लाता है ... और तोता उन्हें खा कर खुश रहने कि कोशिश करता है ....ये सोच कर कि शायद किसी दिन ऐसे ही खुश रहते रहते वो खुश होना भी सीख जाएगा...
तोता साँसे ले रहा है आज भी .... खुश होने और खुश रहने के बीच के फासले को नापता ...
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।
हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती सॉंसों की डोरी ।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।
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