Thursday, June 3, 2010

एक कहानी : राहुल और तोता

उस दिन राहुल को घर जाने के रस्ते में एक घायल तोता मिला...
राहुल उसे उठा कर अपने घर ले गाया , उसके ज़ख्मों पर मलहम लगा कर राहुल ने तोते को फिर से चंगा कर दिया...

तोता ठीक होते ही उड़ने लगा , राहुल एक पिंजरा ले आया इस डर से कि कहीं तोता उस से दूर उड़ ना जाए
राहुल ने तोते को पिंजरे में रख दिया और रोज़ उस से बातें करने लगा ... तोते के लिए राहुल मीठे फल रोज़ ढूँढ कर लाता था ,

एक दिन राहुल ने चुपके से देखा कि तोता पिंजरे में उड़ने के लिए पंख फडफडा रहा है ,
राहुल को गलती का एहसास हुआ , राहुल को लगा कि उनसे तोते को छोटे पिंजरे में बंद कर के गलती कि है ...
राहुल कि वजह से तोते की उड़ते रहने कि ख़ुशी दूर हो गयी....


ये सोच राहुल को परेशान रखने लगी ...फिर एक दिन राहुल बड़ा पिंजरा लाया ...कमरे जितना बड़ा पिंजरा जिस में राहुल भी आ जा सकता था..

राहुल ने तोते को खुले कमरे में छोड़ा और कहा " खूब उडो खूब खुश रहो , तुम खुश हो तो मै खुश हूँ ..."

तोता मुस्कुराया ...कुछ पंख पसारे और कमरे का चक्कर लगा कर वापस राहुल के कंधे पर आ कर बैठ गाया,
राहुल खुश था ये सोच कर कि उसने तोते की ख़ुशी आखिर ढूंढ ही ली...

राहुल जैसे सब जनता था कि तोता  कैसे खुश रह सकता है ... पर वो नहीं जनता था कि तोता कैसे खुश हो सकता है ...

राहुल को यकीन था कि तोता कैसे खुश रहेगा यह वो ही सबसे अच्छी तरह जनता है ... खुद तोते को भी नहीं पता कि जिंदगी को कैसे जीना है ....सीधी बात है अगर तोते को ज़िन्दगी जीने का ढंग आता तो क्यों वो घायल पड़ा होता सड़क पर...

अब सब ठीक है .... राहुल आज भी तोते को खुश करने के लिए ढेर सारे फल लाता है ... और तोता उन्हें खा कर खुश रहने कि कोशिश करता है ....ये सोच कर कि शायद किसी दिन ऐसे ही खुश रहते रहते वो खुश होना भी सीख जाएगा...

तोता साँसे ले रहा है आज भी .... खुश होने और खुश रहने के बीच के फासले को नापता ...


हम पंछी उन्मुक्त गगन के


पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे

कनक-तीलियों से टकराकर

पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।



हम बहता जल पीनेवाले

मर जाऍंगे भूखे-प्यासे

कहीं भली है कटुक निबोरी

कनक-कटोरी की मैदा से ।



स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में

अपनी गति, उड़ान सब भूले

बस सपनों में देख रहे हैं

तरू की फुनगी पर के झूले ।



ऐसे थे अरमान कि उड़ते

नील गगन की सीमा पाने

लाल किरण-सी चोंच खोल

चुगते तारक-अनार के दाने ।



होती सीमाहीन क्षितिज से

इन पंखों की होड़ा-होड़ी

या तो क्षितिज मिलन बन जाता

या तनती सॉंसों की डोरी ।



नीड़ न दो, चाहे टहनी का


आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो


लेकिन पंख दिए हैं तो


आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।

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